एक हिट फिल्म जिसने करोडो की कमाई की है जो लोगो के दिलो में बस चुकी है उसका रीमेक बनाना है कभी कभी मेकर्स को करोड़ो के कर्जे में डूबा देता है। वजह सिर्फ इतनी नहीं होती कि नई फिल्म अच्छी नहीं बनी। मुश्किल तब शुरू होती है जब दर्शक पहले वाली फिल्म के किरदारों और कलाकारों को अपने मन में एक जगह दे चुका होता है।
फिर उसी कहानी में नए चेहरे आते हैं तो दर्शक फिल्म को अकेले नहीं देखता, तुलना भी करता रहता है। Bollywood Remake vs Original को दिलचस्प बनाती है, फिल्म के रीमेक में बड़े स्टार जो कास्ट किया जा सकता है, बजट बढ़ाया जा सकता है कहानी भी एक जैसी रखी जा सकती है लेकिन पहली फिल्म जिसके किरदार और उनकी एक्टिंग लोगो के दिलो में बस चुके है उसकी जगह सिर्फ पैसे लगाने से नहीं ली जा सकती है ।
Why Bollywood Remakes Fail को समझने के लिए आगे कुछ ऐसी फिल्मों की बात होगी जिन्होंने मूल रूप में खूब कमाई की, दर्शकों को पसंद आईं, लेकिन उनका रीमेक बुरी तरह गिर गया। कहीं कहानी की गलती थी, कहीं समय बदल चुका था और कहीं एक ऐसा किरदार था जिसकी जगह नया कलाकार भर ही नहीं पाया।
आखिर ऐसी कौन कौन सी फिल्में थीं, उनके रीमेक क्यों चले नहीं और क्या सच में एक किरदार पूरी फिल्म को बचा सकता है?
रीमेक बनाना आसान क्यों लगता है?
मेकर्स जब भी कोई फिल्म बनाने का सोचते है तो उनके लिए सबसे सबाल और काम होता है फिल्म की स्टोरी और उस पर पैसा लगाना, फिर भी मन में बहुत सारे ख्याल होते है कि कोई इस फिल्म को देखने आएगा या नहीं, दर्शको यह फिल्म पसंद आएगी या नहीं।
नई कहानी के साथ पहले से यह सब जबाब नहीं मिल पाते है, लेकिन रीमेक में कम से कम इतना पता होता है कि कहानी हिट हो चुकी है बॉक्स ऑफिस पर अच्छा पैसा भी बना चुकी और दर्शको को पसंद भी आयी है।
रीमेक बनाने की यह एक बहुत बड़ी बजह भी है और समझदार बाला फैसला भी लगता है हिट फिल्म का रीमेक बनाओ और कमाई करो क्योकि इसकी कहानी पहले ही पसंद की जा चुकी है और किरदार भी पहले ही तय है और एक सफल फिल्म का उदाहरण सामने है। निर्माता को लगता है कि उसने सबसे बड़ा जोखिम कुछ हद तक कम कर लिया।
लेकिन यहां एक चीज आसानी से नजरअंदाज हो जाती है। फिल्म की कहानी दोबारा खरीदी जा सकती है, उसकी पहली सफलता नहीं।
किसी फिल्म के चलने के पीछे सिर्फ कहानी नहीं होती। उस समय के कलाकार कौन थे, दर्शक किस तरह की फिल्में देख रहे थे, संवाद क्यों असर कर रहे थे, संगीत कितना जुड़ रहा था और वह कहानी उस समय लोगों को अपनी क्यों लग रही थी इन सबका असर होता है।
रीमेक बनाते समय कहानी आपके पास रहती है। बाकी बहुत कुछ बदल चुका होता है।
मान लीजिए किसी फिल्म में एक किरदार का गुस्सा 1970 के दशक में दर्शकों को अपने आसपास की व्यवस्था से जुड़ा हुआ महसूस होता था। वही किरदार आज की फिल्म में सिर्फ गुस्सैल आदमी लग सकता है, अगर उसके गुस्से के पीछे आज के समय की कोई वजह ही न हो।
यहीं रीमेक की असली परीक्षा शुरू होती है।
सवाल यह नहीं कि पुरानी फिल्म कितनी अच्छी थी। सवाल यह है कि आज वही कहानी देखने की वजह क्या है? यही कारण है कि किसी हिट फिल्म का रीमेक बनाना आसान फैसला हो सकता है, लेकिन उसे दोबारा सफल बनाना बिल्कुल अलग काम है।
फिल्म की सफलता दोहराना मुश्किल क्यों होता है, खासकर Bollywood Remake vs Original?

मुझे किसी फिल्म की कहानी का पहले से पता होना और उसे दोबारा नए एक्टर्स के साथ देखने का मन होना दोनों अलग बाते है। ऐसे ही फिल्मो को देखने बाली ऑडियंस भी पहली ओर्जिनल फिल्म की कहानी को देखना ज्यादा पसंद करती है। क्योकि उसे पहले यह नहीं पता होता है फिल्म में क्या होगा, क्या सस्पेंस आने बाले है और कहानी का अंत क्या होने बाला है, हर नई घटना उसके लिए पहली बार सामने आती है।
रीमेक में क्या होता है कि ऑडियंस को पहले से ही फिल्म की कहानी का पता होता है बस उसे नए एक्टर्स और लोकेशन के साथ दिखाया जाता है, ऐसे में उसका ध्यान कहानी पर तो बिलकुल नहीं होता है। वह यह भी देखने लगता है कि नई फिल्म उस जानी पहचानी कहानी को अलग क्या दे रही है।
यहीं रीमेक की असली मुश्किल सामने आती है।
| पहली बार कहानी देखते समय | रीमेक देखते समय |
|---|---|
| आगे क्या होगा, पता नहीं होता | कहानी का रास्ता पहले से पता हो सकता है |
| हर मोड़ नया लगता है | पुराने मोड़ों से तुलना शुरू हो सकती है |
| कहानी खुद आगे खींचती है | फिल्म को देखने की नई वजह देनी पड़ती है |
जर्सी इसका अच्छा उदाहरण है।
2019 में नानी की जर्सी आई थी और इसका निर्देशन गौतम तिन्ननुरी ने किया था। 2022 में इसी कहानी का हिंदी रूप शाहिद कपूर के साथ आया और इसका निर्देशन भी गौतम तिन्ननुरी ने किया था।
तब तक दूसरी भाषा की फिल्मों तक दर्शकों की पहुंच पहले से आसान हो चुकी थी। इसलिए हिंदी दर्शकों के एक हिस्से के लिए जर्सी की कहानी पूरी तरह अनजान नहीं थी।
शहीद कपूर की फिल्म जर्सी जिससे मेकर्स को बहुत उम्मीद थी बो नहीं चल पायी थी, क्योकि तेलगू में नानी की जर्सी मूवी बहुत हिट हुई थी जिसके बारे में लगभग सभी ने उस फिल्म को देखा था, शहीद की यह रीमेक बॉक्स ऑफिस पर फेल हो गयी थी।
इन दोनों मूवी के कलेक्शन में भी यह फर्क साफ़ नज़र आता है तेलुगु में बानी जर्सी जिसमे नानी एक मेन किरदार में थे उनकी मूवी ने और शहीद कपूर की मूवी ने जो कमाई की है बो कुछ इस तरह है।
- नानी की जर्सी मूवी ने ग्लोबली लगभग 51 करोड़ की कमाई की जबकि इसका बजट लगभग 25 करोड़ था।
- शहीद कपूर की रीमेक ने लगभग 23 करोड़ की कमाई की थी।
लेकिन यहां एक बड़ी बात समझ आती है। रीमेक की सबसे बड़ी परेशानी यह हो सकती है कि जिस कहानी की पहचान उसे दर्शक तक पहुंचाती है, वही पहचान दर्शक को पहली फिल्म की याद भी दिलाती रहती है।
अब दर्शक सिर्फ यह नहीं देख रहा कि कहानी अच्छी है या नहीं। वह अनजाने में तुलना भी कर रहा है वही किरदार, वही घटनाएं, वही मोड़ और वही कहानी इस बार कैसी लगी।
इसलिए हर सफल रीमेक को पुरानी कहानी बदलने की जरूरत नहीं होती। उसे बस यह समझना पड़ता है कि पहली फिल्म देखने के बाद भी इस कहानी को दोबारा देखने की वजह क्या है।
कभी वह वजह नया कलाकार हो सकता है। कभी कहानी को आज के जीवन से जोड़ने का तरीका। कभी वही किरदार किसी नए नजरिए से सामने आ सकता है। और कभी फिल्म किसी पुराने दृश्य को इस तरह पेश कर सकती है कि उसका असर पहले से अलग महसूस हो।
पहली फिल्म कहानी दे चुकी होती है। रीमेक को उसी कहानी को दोबारा देखने की वजह देनी होती है।
यही Bollywood Remake vs Original की असली परीक्षा है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन-सी फिल्म बेहतर है। असली सवाल यह है कि जब दर्शक को पहले से पता है कि कहानी कहां जाएगी, तब नई फिल्म उसे फिर से उस सफर पर क्यों ले जाना चाहती है।
अगर इसका मजबूत जवाब फिल्म के अंदर नहीं मिलता, तो अच्छी कहानी भी रीमेक को सफल बनाने के लिए काफी नहीं होती।
शोले जैसी फिल्मों का रीमेक बनाना इतना मुश्किल क्यों होता है?

कुछ फिल्मों की पहचान सिर्फ उनकी कहानी तक सीमित नहीं रहती। उनके किरदार और रिश्ते दर्शकों के मन में ऐसी जगह बना लेते हैं कि बाद में उनका नया रूप आते ही तुलना शुरू हो जाती है।
2007 में राम गोपाल वर्मा ने शोले को राम गोपाल वर्मा की आग के रूप में पेश किया। अमिताभ बच्चन, मोहनलाल और अजय देवगन जैसे बड़े कलाकार होने के बावजूद फिल्म असफल रही। उस समय की समीक्षाओं में भी शोले से होने वाली तुलना और नए किरदारों के कमजोर असर की बात सामने आई।
अब बात करते है इन दोनों फिल्मो की बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की ओरिजिनल शोले और राम गोपाल वर्मा की आग की तो इन दोनों में ज़मीन आसमान का फर्क दिखाई देता है।
- Original Sholay (1975): ₹100+ करोड़।
- Ram Gopal Varya Ki Aag (2007): ₹12 .5 करोड़।
लेकिन Why Bollywood Remakes Fail को समझने के लिए सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि फिल्म अच्छी नहीं थी। दर्शक नई फिल्म को अकेले नहीं देख रहा था। उसके मन में शोले की पुरानी छवि पहले से थी। इसलिए हर नया किरदार और रिश्ता अनजाने में उसी याद से तुलना झेल रहा था।
यही रीमेक की बड़ी मुश्किल है:
- पुरानी फिल्म की पहचान पहले से मजबूत होती है।
- दर्शक कहानी और किरदारों को पहले से जानता है।
- नई फिल्म को उसी आधार पर अपनी अलग पहचान बनानी होती है।
इसी वजह से किसी रीमेक का असफल होना केवल कहानी की कमजोरी से नहीं समझा जा सकता। उसे यह भी बताना पड़ता है कि दर्शक वही कहानी दोबारा क्यों देखे।
और यही सवाल कई flop movies in bollywood को समझने में भी मदद करता है।
पुराने दौर की फिल्मों को आज के दर्शकों के लिए बनाना कितना कठिन है?

फिल्म की कहानी घटनाओ और उसके किरदारों या एक रैंडम कहानी से नहीं बनायीं जाती है, जब बो फिल्म आती है उस समय में लोगो की परेशानिया या अब ऑडियंस क्या देखना चाहती है बो बहुत मायने रखता है। क्युकी समय समय पर दर्सको को सोच और चॉइस दोनों बदलती रहती है।
1973 की ज़ंजीर इसका अच्छा उदाहरण है, जिससे सब कुछ अभी समझ आ जायगा। इस फिल्म में इस सदी के नायक अमिताभ बच्चन ने विजय का एक दमदार किरदार निभाया था, जिसका गुस्सा और एंग्री लुक उस फिल्म की पहचान बना जो उस दौर में बहुत पसंद किया गया था। व्यवस्था से नाराज एक आदमी की यह छवि उस समय के दर्शकों के लिए ज्यादा सीधी और असरदार थी। जो आम लोगो के जिंदगी से जुडी हुई थी जिसे बेहद पसंद किया गया था।
चार दशक बाद, 2013 में इसी फिल्म का नया रूप राम चरण और प्रियंका चोपड़ा के साथ आया। फिल्म में पुराने किरदार और मूल कहानी का आधार मौजूद था, लेकिन वह दर्शकों के बीच वैसा असर नहीं बना सकी।
मैं जब भी किसी पुरानी फिल्म का रीमेक देखता हूँ तो मैं उसके बारे में महसूस करता हूँ कि फिल्म की कहानी तो मुझे पता चल गयी है, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि नई फिल्म उस दौर वाली बात को पकड़ नहीं पाती, जिस किरदार या उसकी एक्टिंग की बजह से मैंने फिल्म को आज भी याद रखा है। यही मेरे लिए बहुत बड़ा फर्क होता है, किसी रीमेक को सिर्फ पुरानी कहानी का नया रूप और दोबारा बैसे ही कहानी को ढालने में दिखाई देता है।
यहीं पुराने और नए दौर के बीच का फर्क समझ आता है।
| पुरानी फिल्म में | रीमेक में सवाल |
|---|---|
| किरदार उसी दौर में जी रहा था | क्या वह आज भी वैसा ही लगेगा? |
| उसकी दुनिया अलग थी | क्या आज की दुनिया में उसकी बात बैठेगी? |
| उसकी मुश्किल तब की थी | आज उसकी मुश्किल क्या होगी? |
| उसका फैसला तब सही लगा | क्या आज भी दर्शक उससे सहमत होगा? |
रीमेक में सिर्फ कपड़े, गाड़ियां, जगहें और एक्शन बदल देने से समय नहीं बदलता। किरदार के आसपास की दुनिया भी बदलनी पड़ती है।
यही वजह है कि पुराने दौर की फिल्म को आज दोबारा बनाना सिर्फ पुरानी कहानी को नए कलाकारों के साथ शूट करने का काम नहीं है। अगर फिल्म यह नहीं समझ पाती कि आज के दर्शक उस कहानी से क्यों जुड़ेंगे, तो अच्छी मूल कहानी भी नए रूप में कमजोर पड़ सकती है।
क्या कहानी की नकल रीमेक की सबसे बड़ी गलती है?

किसी भी फिल्म का रीमेक बनाने में उसकी पुरानी फिल्म की कहानी को कॉपी करना गलत तो नहीं है। लेकिन दिक्कत तब सामने आती है, जब मेकर्स यही भूल जाते है यह ओरिजिनल फिल्म को लोगो ने किसके लिए पसंद किया था उस दौर के लिए जब बो बनी थी, या किसी एक खास एक्टर या उसके सांग लिए। क्योकि ऐसा बहुत बार हुआ है ओरिजनल फिल्म ने तो बॉक्स ऑफिस और लोगो के दिलो पर राज किया है, लेकिन बही उसका रीमेक बुरे तरह फेल हुआ है।
2023 की में आई रीमेक फिल्म शहज़ादा इसका एक अच्छा उदाहरण है। यह फिल्म 2020 की तेलुगु फ़िल्म अला वैकुंठपुरमुलू की स्टोरी का रीमेक थी। दोनों ही फिल्मो की कहानी लगभग एक जैसी थी। लेकिन यहाँ गलती क्या हुई, जो फिल्म तेलुगु में हिट हुई बहा के लोगो ने उसे पसंद किया जरुरी नहीं बो सेम फिल्म बॉलीवुड में भी चलती।
बॉलीवुड और तेलुगु फिल्म के कल्चर अलग है, ऑडियंस की पसंद अलग है लोग अलग है जगह अलग है। सिर्फ बजट बढ़ाकर बड़े एक्टर को कास्ट करके रीमेक बनाना इस बात की गारंटी नहीं है कि फिल्म हिट होगी।
शहज़ादे फिल्म के फ्लॉप होने की बड़ी बजह यह भी थी कि अला वैकुंठपुरमुलू में अल्लू अर्जुन ने जिन्हे साऊथ में बहुत पसंद किया जाता है, और यह फिल्म पहले से ही हिंदी में भी मौजूद थी। बही दूसरी तरफ इसके रीमेक शहज़ादा में कार्तिक आर्यन को कास्ट किया गया था जो अल्लू अर्जुन जितना इम्पैक्ट और एफर्ट नहीं डाल पाए।
अला वैकुंठपुरमुलू फिल्म में अल्लू अर्जुन का अंदाज भी कहानी का बड़ा हिस्सा था। उसके बोलने का तरीका, चलने का ढंग और किरदार की मस्ती उसी फिल्म के साथ जुड़ गई थी। हिंदी फिल्म में कार्तिक आर्यन ने वही किरदार अपने तरीके से निभाया, लेकिन तुलना से बचना आसान नहीं था।
यहां रीमेक बनाने वाले के सामने असली सवाल आता है।
क्या पुरानी फिल्म की हर चीज रखनी जरूरी है? नहीं। कुछ चीजें कहानी के लिए जरूरी होती हैं। कुछ चीजें उस खास फिल्म और उसके कलाकारों के कारण काम करती हैं।
| पुरानी फिल्म से क्या रखना है | क्या नए सिरे से सोचना है |
|---|---|
| कहानी का मुख्य आधार | किरदार का अंदाज |
| जरूरी रिश्ते | हंसी वाले हिस्से |
| कहानी का बड़ा टकराव | बातचीत का तरीका |
| किरदार की असली वजह | उसके आसपास की दुनिया |
यहीं Why Bollywood Remakes Fail का एक बड़ा जवाब मिलता है। रीमेक में समस्या सिर्फ पुरानी फिल्म की नकल करने से नहीं आती। समस्या तब आती है जब फिल्म यह पहचान नहीं पाती कि क्या सच में जरूरी है और क्या सिर्फ पुरानी फिल्म के साथ अच्छा लग रहा था।
एक कलाकार के लिए काम करने वाली चीज दूसरे कलाकार के साथ वैसी ही चले, यह जरूरी नहीं। एक भाषा में मजेदार लगा हिस्सा दूसरी भाषा में उतना मजेदार लगे, यह भी तय नहीं। इसलिए अच्छा रीमेक पुरानी फिल्म को छोड़ता नहीं है। वह यह चुनता है कि क्या बचाना है और क्या अपने हिसाब से बदलना है।
यही फैसला कई बार रीमेक को अलग बनाता है
दर्शक रीमेक की तुलना मूल फिल्म से क्यों करता है?
यह पूरी तरह से मानव मनोविज्ञान का हिस्सा है। जब कोई दर्शक पहली बार कोई सस्पेंस थ्रिलर या भावनात्मक ड्रामा देखता है, तो उसका अनुभव सहज और तीव्र होता है। वह कहानी को ‘जी’ रहा होता है।
जब कोई दर्शक जिसने पहले से ही ओरिजिनल फ़िल्म देखी हो, उसका रीमेक देखने जाता है, तो वह अनजाने में ही दोनों की तुलना करने लगता है। वह सोचता है: नए एक्टर ने उस किरदार को कैसे निभाया? क्या डायलॉग वैसे ही लगे? क्या क्लाइमैक्स ओरिजिनल फ़िल्म जितना ही अच्छा था? नतीजतन, दर्शक नई फ़िल्म का अनुभव अकेले में नहीं कर पाता; उसके दिमाग में साथ-साथ ओरिजिनल फ़िल्म भी चलती रहती है। रीमेक कहानी को पहली बार अनुभव करने का वह अनोखा मज़ा नहीं दे पाता।
कौन सी रीमेक काम करती है, कौन सी नहीं अंतर क्या है?
रीमेक लोगो कितना पसंद आएगा, अच्छा होगा या ख़राब इसका फैसला इस बात से तो नहीं किया जा सकता है, कि उसने पुरानी फिल्म की कहानी कितनी ठीक से रखी।
मेरे हिसाब से फर्क इस बात का पड़ता है कि रीमेक में पुरानी कहानी के साथ किरदार कितना अच्छा परफॉर्म करते है और कहानी को किस नए ट्विस्ट के साथ ऑडियंस के सामने रखते है मेकर्स यह बहुत असर डालता है रीमेक को हिट करने में।
अब इसको हम विक्रम वेधा के उदाहरण से समझने की कोसिस करते है, 2017 में आई तमिल फिल्म के बाद 2022 में उसी फिल्म का रीमेक सैफ अली खान और ऋतिक रोशन को लेकर बानी थी। दोनों फिल्मों के पीछे वही निर्देशक जोड़ी थी, इसलिए कहानी को समझने वाले लोगों के लिए यह कोई अनजानी फिल्म नहीं थी।
यहां एक बड़ी मुश्किल पहले से मौजूद थी। जिन जिन लोगो ने बो फिल्म पहले ही देखली थी उनके लिए इस फिल्म में सैफ अली खान और ऋतिक रोशन का कास्ट होना काफी नहीं था। उन्हें चाहिए था ये नई फिल्म उसी कहानी के साथ और क्या क्या नया ट्विस्ट सामने रख सकती है। सिर्फ एक्टर बदलना और उनके लुक को मॉडर्न बना देने से फिल्म लोगो को पसंद आ जाए यह बहुत मुश्किल है। ऑडियंस यह भी महसूस होना चाहिए कि इस बार कुछ ऐसा देखने को मिलेगा जो पहले नहीं मिला था।
और मेरी राय में, यहीं पर विक्रम वेधा को लेकर सबसे बड़ा सवाल उठता है।
यह कहना सही नहीं होगा कि फिल्म सिर्फ इसलिए नहीं चली क्योंकि वह रीमेक थी। फिल्म का प्रदर्शन कई चीजों से तय होता है। लेकिन पहले से जानी कहानी और पहले देखे जा चुके किरदारों के कारण नई फिल्म को शुरुआत से ही ज्यादा तुलना झेलनी पड़ी।
इसे आसान तरीके से देखें:
| अगर रीमेक में यह हो | तो क्या होता है |
|---|---|
| कहानी वही रहे, लेकिन देखने का तरीका नया हो | दर्शक फिर भी जुड़ सकता है |
| कलाकार अपनी अलग छाप छोड़ें | तुलना थोड़ी कम हो सकती है |
| पुराने हिस्से वैसे ही रख दिए जाएं | पहली फिल्म बार-बार याद आती है |
| नई फिल्म के पास अपनी खास वजह न हो | दर्शक पूछता है, इसे फिर क्यों देखें? |
मेरी नजर में अच्छा रीमेक पुरानी फिल्म से भागता भी नहीं और उसके पीछे छिपता भी नहीं।
वह जानता है कि कहानी पहले से लोगों तक पहुंच चुकी है। इसलिए उसे अपनी तरफ से कुछ ऐसा देना पड़ेगा, जिसके कारण दर्शक उसे सिर्फ दोबारा सुनाई गई कहानी न समझे। यही वजह है कि रीमेक बनाते समय सबसे जरूरी फैसला यह नहीं होता कि क्या-क्या वही रखना है।
असली फैसला यह होता है कि क्या बदलना जरूरी है। और यही जगह है जहां कई flop movies in bollywood की कहानी सिर्फ “फिल्म अच्छी नहीं थी” कहकर खत्म नहीं की जा सकती।
कई बार फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि उसने पुरानी फिल्म से इतना कुछ बचाकर रखा कि अपनी फिल्म के लिए जगह ही कम बची। मेरे हिसाब से रीमेक की सफलता का सबसे सीधा टेस्ट यही है: अगर दर्शक को पहले वाली फिल्म याद ही न हो, तब भी क्या यह नई फिल्म अपने दम पर देखने लायक है?
अगर जवाब हां है, तो रीमेक के पास खड़े होने की अपनी वजह है। अगर जवाब सिर्फ इतना है कि “कहानी तो पहले से हिट है”, तो वहां खतरा शुरू हो जाता है।
क्या हर हिट फिल्म का रीमेक बनना चाहिए?
नहीं। सिर्फ इसलिए कि कोई फिल्म हिट हुई है, उसका रीमेक बनाना जरूरी नहीं है।
मेरे हिसाब से रीमेक तभी बनना चाहिए जब कहानी को नए दौर या नए दर्शकों के सामने रखने की कोई ठोस वजह हो। सिर्फ पुराने नाम के भरोसे फिल्म बनाना काफी नहीं है।
एक आसान कसौटी है:
- क्या आज भी कहानी में कुछ ऐसा है जो लोगों से जुड़ सकता है?
- क्या नए कलाकार उस कहानी में कुछ अपना ला सकते हैं?
- क्या फिल्म को आज के समय के हिसाब से नए तरीके से बताया जा सकता है?
अगर इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तो रीमेक सिर्फ पुरानी सफलता को दोहराने की कोशिश बनकर रह जाता है।
यहीं Bollywood Remake vs Original का फर्क भी समझ आता है। नई कहानी में दर्शक पहली बार कुछ खोजता है। रीमेक में फिल्म को पहले से जानी चीज के बीच अपनी जगह बनानी पड़ती है।
मेरी नजर में हिट फिल्म रीमेक बनाने का कारण हो सकती है, लेकिन रीमेक बनाने की वजह नहीं। वजह कहानी के अंदर होनी चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बॉलीवुड की रीमेक फ़िल्में अक्सर क्यों फ़्लॉप हो जाती हैं?
मुझे ऐसा लगता है बॉलीवुड में बनने बाली ज्यादातर रीमेक इसीलिए फ्लॉप होती है क्योकि ऑडियंस को पहले से ही फिल्म की स्टोरी का पता होता है ज़्यादातर लोगों ने ओरिजिनल फ़िल्म पहले ही देख ली होती है। यह बस पुरानी फ़िल्म को दोहराना भर रह जाता है।
क्या रीमेक हमेशा ओरिजिनल फ़िल्म से कमतर होते हैं?
नहीं, हमेशा ऐसा नहीं होता। दृश्यम एक रीमेक थी, फिर भी इसने ओरिजिनल फ़िल्म से ज़्यादा कमाई की और दर्शकों का भरपूर प्यार पाया। असल बात यह है कि अगर कोई डायरेक्टर कहानी को समझता है, उसे अपने अंदाज़ में ढालता है और एक नया नज़रिया पेश करता है, तो रीमेक अपनी एक अलग पहचान बना सकती है।
ओरिजिनल फ़िल्म और रीमेक के बीच सबसे बड़ा फ़र्क क्या है?
एक ओरिजिनल फ़िल्म एक सच्ची कहानी दिखाती है जिसमें नए, अप्रत्याशित मोड़ और चौंकाने वाला अंत होता है। इसके उलट, रीमेक में कहानी, उसका अंत और घटनाओं का क्रम पहले से ही पता होता है; बस कास्ट और लोकेशन बदल दिए जाते हैं।

I’m Mukeem Uddin, founder of CinemaVinema and a cinema writer. I write about character actors, filmmaking, casting, storytelling, and the business of Hindi cinema. My focus is on the stories and details that often get overlooked in mainstream coverage.
