Old Bollywood Comedy Movies की बात करें तो ‘चुपके चुपके’, ‘गोलमाल’ और ‘पड़ोसन’ ऐसी फिल्में हैं जो दशकों के बाद भी अपनी कॉमेडी के लिए जानी जाती है। पता है इन फिल्मों में सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनके लिए बड़े सेट की जरूरत नहीं पड़ी बस एक्टर्स ने अपने एक्टिंग और कॉमिक टाइमिंग से इन्हे इतना अच्छा बनाया। कहानी में बने छोटे छोटे भ्रम, मजेदार किरदार और और इन फिल्मो में काम कर रहे एक्टर्स ने अंदाज़ से सबको हसाया है।
‘गोलमाल’ में अमोल पालेकर का एक ही अभिनेता होकर दो अलग-अलग किरदार निभाना, और दोनों का अपना अलग अंदाज़, आज भी उतना ही हंसाता है। रामप्रसाद खुद को दो अलग अलग इंसान दिखाने के लिए बहुत ही अनोखे अंदाज़ में कभी अपनी मूंछें सेव करता है तो कभी नकली मूंछें लगाता है, उसका यह अंदाज़ मजेदार नज़र आता है।
चुपके चुपके और पड़ोसन रोजमर्रा की जिंदगी को ऐसे पेश करती हैं कि उनके मजेदार पल आज भी पुराने नहीं लगते। यही वजह है कि साठ और सत्तर के दशक की ये पुरानी हिंदी कॉमेडी फिल्में आज भी देखने पर उतनी ही मजेदार लगती हैं।
‘गोलमाल’ देखते समय, मुझे नकली मूंछ वाला सीन आज भी उतना ही मज़ेदार लगता है क्योंकि इसमें मज़ा इस लगातार डर से पैदा होता है कि कहीं झूठ पकड़ा न जाए।
Old comedy movies bollywood आज भी क्यों चलती हैं?
पुरानी कॉमेडी फिल्मों को देखते हुए एक चीज़ तुरंत समझ आती है। उनकी हंसी किसी चलन या मजेदार लाइन पर नहीं टिकी थी। कहानी में लोग थे, उनके रिश्ते थे और उन्हीं से निकलती छोटी-छोटी उलझनें थीं।
कई बार मामला बस इतना होता था कि किसी ने घरवालों से एक बात छिपा ली। फिर उसे छिपाने के लिए दूसरी बात कहनी पड़ी और देखते ही देखते बात काफी आगे निकल गई। ‘चुपके चुपके’, ‘गोलमाल’ और ‘पड़ोसन’ में ऐसी ही स्थितियां खूब देखने को मिलती हैं।
साल 1979 में आई फिल्म गोलमाल में भवानी शंकर ( उत्पल दत्त ) एक ऐसा किरदार है जो मूँछ के बिना किसी भी आदमी को चरित्रहीन मानता है, वह हमेशा बड़ी मूंछों वाले आदमियों को पसंद करता आया है। वह दफ्तर के कर्मचारियों का संगीत सुनना, खेलना या फिल्म देखने जाना बिल्कुल पसंद नहीं करता था। यही सोच कहानी का मुख्य झगड़ा बनती है।
इन फिल्मों में कलाकारों को हंसाने के लिए हर वक्त कुछ अजीब करने की जरूरत नहीं थी। कई बार एक नजर, एक जवाब या सही समय पर कही गई बात ही काफी थी। यही चीज इन फिल्मों को दोबारा देखने पर भी काम करती है। धर्मेंद्र (प्यारे मोहन) प्रोफेसर के सामने शुद्ध हिंदी में ऐसी अजीबोगरीब बातें करते हैं कि हंसी आ जाती है। फिर अपनी अनोखी अंग्रेजी से ओम प्रकाश (जीजाजी) को ऐसा उलझाते हैं कि पूरा सीन ही मजेदार बन जाता है।
Padosan (1968)

1968 में आई पड़ोसन ऐसी कॉमेडी फिल्म है जिसमें सुनील दत्त, किशोर कुमार, महमूद और सायरा बानू साथ नजर आते हैं। फिल्म की कहानी और इन कलाकारों की मस्ती मिलकर इसे उस दौर की यादगार कॉमेडी बना देती है।
भोला (सुनील दत्त) सीधा सादा आदमी है और वह अपनी पड़ोसन बिंदु (सायरा बानू) से इश्क़ कर बैठता है। बिंदु को म्यूजिक का शौक होता है इसलिए बो गुरु पिल्लई (महमूद ) से म्यूजिक सीख रही होती है यहाँ मजेदार बात यह यह होती है मास्टर बिंदु से शादी करना चाहते हैं, लेकिन बिंदु उनके डांस और म्यूजिक के बजह से साथ होती है। अब भोला को बिंदु का दिल जीतना है। इसमें उसका दोस्त (किशोर कुमार) उसकी मदद करता है और फिर यहीं से फिल्म की मजेदार कहानी शुरू होती है।
किशोर कुमार का किरदार अपनी थिएटर मंडली के साथ भोला के लिए प्लेबैक गाने की तरकीब निकालता है। इस फिल्म में एक आइकोनिक गाना भी है एक चतुर नार वड़ी होशियार में जिस तरह किशोर कुमार प्लेबैक सिंगिंग करते है और सुनील दत्त ऐसा दिखाते है जैसे वह गा रहे हों वहां पर बहुत हसीं आती है।
Chupke Chupke (1975)

ऋषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म में परिमल त्रिपाठी (धर्मेंद्र) अपनी पत्नी के जीजाजी राघवेंद्र शर्मा (ओम प्रकाश) को सबक सिखाने के लिए प्यारे मोहन बनकर उनके घर पहुंच जाते हैं। शुद्ध हिंदी बोलने वाला यह ड्राइवर राघवेंद्र को खूब परेशान करता है। फिर परिमल का दोस्त सुकुमार सिन्हा (अमिताभ बच्चन) भी इस खेल में फंस जाता है और मामला और उलझ जाता है।
इस फिल्म के एक सीन में मुझे बहुत हसीं आयी जब धर्मेंद्र अपने जीजा जी को बोलते है कि वे भेंगे हैं और यह बताते बताते जिस तरह वह हकलाना शुरू कर देते हैं तब जीजा जी का चेहरा जिस तरह से बनता है वह बहुत हंसाता है।
ऐसे ही एक सीन में जीजा अपनी अंग्रेजी में बात करते है तभी धर्मेंद्र अपनी शुद्ध हिंदी में बात करते है जिससे जीजा जी की अंग्रेजी फीकी पड़ने लगती है जिसे देखने में मजा आता है।
यह फिल्म सिर्फ भाषा नहीं बल्कि किरदारों में बीच बीच में पैदा होने वाली गलतफहमी और कॉमिक टाइमिंग का खेल है। उस दौर में अमिताभ बच्चन की यंग एंग्री मैन वाली इमेज थी फिर भी उन्होंने इस कॉमेडी फिल्म में बहुत अच्छे से सबको हंसाया। फिल्म की स्क्रिप्ट और इसके डायलॉग्स की टाइमिंग बेजोड़ है।
गोलमाल (1979): एक झूठ और फिर झूठ का सिलसिला\

ऋषिकेश मुखर्जी की 1979 की ‘गोलमाल’ रामप्रसाद (अमोल पालेकर) की मस्ती मजाक की कहानी है, जो एक गुस्सैल व्यक्ति (उत्पल दत्त) के यहां नौकरी करता है। इस फिल्म में असली मजा तब शुरू होता है भवानी शंकर एक बार उसे गलती से हॉकी मैच खेलते हुए देख लेता है। फिर जब रामप्रसाद अपनी नौकरी को बचाने के लिए अपना ही एक जुड़वां भाई लक्ष्मणप्रसाद की कहानी बना देता है।
फिल्म का एक यादगार हिस्सा आखिर में आता है, जब भवानी शंकर को सच पता चलने की जगह एक और गलतफहमी हो जाती है। जैसे ही भवानी शंकर को यह शक होता है कि यह दो अलग अलग भाई नहीं बल्कि एक ही इंसान है, रामप्रसाद वहां से भागने की कोशिश करता है और शंकर उसका पीछा करते करते एक पुलिस स्टेशन पर पहुंच जाते हैं जहा बहुत ज्यादा कॉमेडी देखने को मिलती है।
मेरे लिए गोलमाल की असली खूबी यह है कि इतनी सीधी कहानी को अमोल पालेकर और उत्पल दत्त अपनी अदाकारी से लगातार मजेदार बनाए रखते हैं। कोई बड़ा तमाशा नहीं, फिर भी दोनों के आमने-सामने आते ही सीन में हंसी निकल आती है। आपने अब तक यह मूवी देखी है या नहीं नीचे कमेंट करके जरूर बताना।
अगर आपको ऐसी funny movies hindi पसंद हैं जिनमें कॉमेडी कहानी के साथ चलती है, तो गोलमाल जरूर देखनी चाहिए।
इन फिल्मों में ऐसा क्या था जो आज भी काम करता है?
मैं अगर इन तीनो फिल्मो को एक साथ रख कर देखु तो इतनी पुरानी फिल्मो में जो कॉमेडी थी वो आज भी समझ आती है और हसाती भी है। जैसे चुपके चुपके फिल्म में जीजा साले के बीच जो खटपट देखने को मिली, गोलमाल में एक गुस्सैल बॉस से नौकरी बचाने की कोशिश और ‘पड़ोसन’ में प्यार पाने की जद्दो जहद इन चीजों का मजा किसी एक दौर तक सीमित नहीं है।
इसीलिए old comedy movies bollywood आज की कई फिल्मों के बीच भी अलग खड़ी दिखाई देती हैं। इन फिल्मों में हंसी ज्यादातर किरदारों के स्वभाव, उनकी गलतियों और आपस की नोकझोंक से निकलती है। उत्पल दत्त का अमोल पालेकर को घूरना हो या किशोर कुमार का अपने अंदाज में माहौल संभालना, कई बार सीन की कॉमेडी संवाद से ज्यादा कलाकारों के हाव भाव में होती है।
मुझे इन फिल्मों की यही बात पसंद आती है कि कहानी आगे बढ़ती रहती है और हंसी उसी के साथ आती है। कोई अलग से कॉमेडी डालने की जरूरत महसूस नहीं होती। अगर आपने ये फिल्में अभी तक नहीं देखी हैं।
आपके हिसाब से इन तीनों में सबसे मजेदार फिल्म कौन सी है?
| फिल्म | मेरी रेटिंग |
|---|---|
| चुपके चुपके (1975) | 7.5/10 |
| गोलमाल (1979) | 8/10 |
| पड़ोसन (1968) | 7/10 |
इस तीनो फिल्मो की रेटिंग करते हुए मैंने इन फिल्म के कॉमेडी सीन्स और उनके किरदारों को ध्यान में रखा है। उसी के आधार पर मैंने यह रेटिंग दी है।
FAQs
पड़ोसन का मशहूर गाना कौन सा है?
पड़ोसन फिल्म में वैसे तो कई सारे गाने है लेकिन एक चतुर नार करके श्रिंगार इसका एक आइकोनिक गाना है।
चुपके चुपके फिल्म का निर्देशन किसने किया था?
चुपके चुपके फिल्म को एक अच्छी पुरानी कॉमेडी फिल्म माना जाता है, जिसका निर्देशन हृषिकेश मुखर्जी में किया है।
गोलमाल में अमोल पालेकर ने कितने किरदार निभाए थे?
गोलमाल में अमोल पालेकर का डबल रोल नहीं था अपने गुस्सैल बॉस से नौकरी बचाने के लिए उन्होंने रामप्रसाद शर्मा और लक्ष्मण प्रसाद शर्मा का किरदार किया था।
बॉलीवुड की सबसे अच्छी पुरानी कॉमेडी फिल्में कौन-सी हैं?
चुपके चुपके (1975), गोल माल (1979) और पड़ोसन (1968) को बॉलीवुड की बेहतरीन क्लासिक कॉमेडी फ़िल्मों में गिना जाता है।

I’m Mukeem Uddin, founder of CinemaVinema and a cinema writer. I write about character actors, filmmaking, casting, storytelling, and the business of Hindi cinema. My focus is on the stories and details that often get overlooked in mainstream coverage.
