Daldal Web Series Review: क्या Bhumi Pednekar की यह Prime Series सच में देखने लायक है?

Daldal webseries review in hindi

आजकल जब भी कोई नई क्राइम सीरीज़ आती है, तो मन अपने आप सतर्क हो जाता है। ज़्यादातर कहानियाँ एक जैसी लगने लगी हैं। ऐसे में जब Amazon Prime पर Daldal आई, तो पहली प्रतिक्रिया यही थी कि शायद यह भी उसी कतार में खड़ी होगी। फिर भी, Daldal web series review लिखने से पहले मन में एक हल्की-सी जिज्ञासा थी, खासकर इसलिए क्योंकि इसमें भूमि पेडनेकर मुख्य भूमिका में हैं।

सच कहूँ तो, इस सीरीज़ से बहुत ज़्यादा उम्मीदें नहीं थीं। ट्रेलर ने भी कुछ ऐसा संकेत नहीं दिया था कि कोई बड़ा उलटफेर देखने को मिलेगा। लेकिन जैसे-जैसे एपिसोड आगे बढ़ते हैं, यह साफ होता है कि यह कहानी डराने से ज़्यादा परेशान करने की कोशिश करती है। सवाल बस इतना है कि क्या वह कोशिश पूरी हो पाती है।

यह Daldal web series review उसी अनुभव को समझने की एक ईमानदार कोशिश है, जहाँ सोच तो है, लेकिन उसे कहने का तरीका कई जगह कमजोर पड़ जाता है।

Daldal web series review: यह सीरीज़ असल में किस दिशा में जाना चाहती है

अगर इस सीरीज़ को ध्यान से देखा जाए, तो साफ महसूस होता है कि यह रहस्य पर नहीं, बल्कि मानसिक बोझ पर टिकना चाहती है। यहाँ अपराध किसी चौंकाने वाले मोड़ की तरह नहीं आते, बल्कि एक थकी हुई प्रक्रिया की तरह सामने रखे जाते हैं।

मुंबई अपराध शाखा की उप पुलिस आयुक्त रीटा फरेरा एक ऐसे मामले की जाँच करती हैं, जहाँ अपराध से ज़्यादा भारी वह माहौल है जिसमें यह सब हो रहा है। दफ़्तर का दबाव, अपने फैसलों पर शक और निजी असुरक्षाएँ कहानी का हिस्सा बनती हैं। Daldal web series review में यह बात बार-बार उभरती है कि यहाँ बहादुरी नहीं, बल्कि थकान दिखाई गई है।

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यहाँ एक निजी अनुभव जोड़ना ज़रूरी है। कई बार मुझे लगा कि सीरीज़ जानबूझकर धीमी रखी गई है, ताकि दर्शक उस बेचैनी को महसूस कर सके। लेकिन हर दर्शक इतना धैर्य नहीं रख पाता।

कहानी का असर: घटनाएँ नहीं, उनके पीछे का बोझ

Daldal web series review में कहानी सीधे-सीधे घटनाओं पर नहीं चलती। सीरियल किलर की मौजूदगी कोई बड़ा रहस्य नहीं बनती। उसकी पहचान जल्दी सामने आ जाती है, और यहीं से कहानी का रास्ता बदल जाता है।

अब ध्यान इस बात पर रहता है कि अपराध क्यों हो रहे हैं और उन्हें रोकने की कोशिश कितनी थकाने वाली है। अनाथालय, नशा मुक्ति केंद्र, बीते हुए सालों के ज़ख्म ये सब बातें कहानी में जुड़ती हैं। समय बार-बार पीछे जाता है, कभी कुछ साल पहले, कभी उससे भी पहले। तकनीकी तौर पर यह साफ है, लेकिन भावनात्मक तौर पर हर बार असर नहीं छोड़ पाता।

ईमानदारी से कहूँ तो कुछ जगह ऐसा लगता है कि दर्द सिर्फ बताया गया है, महसूस नहीं कराया गया। यही कमी इस सीरीज़ को कमजोर करती है।

हाल के हिंदी कंटेंट में अपराध को शोर नहीं, बल्कि चुप्पी और मानसिक दबाव के ज़रिए दिखाने का चलन बढ़ा है, जिसकी झलक हाल ही में वध 2 ट्रेलर रिव्यू में भी मिलती है।

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अभिनय का भार: भूमि पेडनेकर और बाकी कलाकार

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Daldal web series review में अभिनय की बात करें तो सबसे बड़ा भार भूमि पेडनेकर के कंधों पर है। रीटा फरेरा के रूप में वह ऊँची आवाज़ या बड़े हावभाव का सहारा नहीं लेतीं। उनका अभिनय दबा हुआ है, शांत है और थका हुआ भी।

कई दृश्यों में उनकी आँखें बहुत कुछ कह जाती हैं। लेकिन कुछ एपिसोड के बाद यही ठहराव दोहराव जैसा भी लगने लगता है।

यहाँ मेरी अपनी राय आती है। मुझे कई बार लगा कि अगर पटकथा उनके किरदार को थोड़ा और खुलने का मौका देती, तो यह भूमिका और असरदार हो सकती थी।

इस सीरीज़ पर दर्शकों की राय लगातार बंटी हुई दिख रही है, और यही वजह है कि इस पर चर्चा थमती नहीं।

सहायक कलाकारों की बात करें तो:

– कुछ चेहरे अपने सीमित समय में भी कहानी को सहारा देते हैं

– कुछ किरदार भावनात्मक आधार देने की कोशिश करते हैं

– लेकिन ज़्यादातर को पूरी तरह उभरने का मौका नहीं मिलता

माहौल और प्रस्तुति: गंभीर दिखने की कोशिश

सीरीज़ का दृश्य संसार जानबूझकर भारी और असहज रखा गया है। मुंबई को चमकदार नहीं, बल्कि बोझिल रूप में दिखाया गया है। संगीत बहुत ज़्यादा हावी नहीं होता, जो कई जगह सही भी लगता है।

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लेकिन कुछ दृश्यों में चुप्पी ज़्यादा असरदार हो सकती थी। एपिसोड की लंबाई और गति कई बार कहानी को धीमा कर देती है। यही वजह है कि Daldal web series review में यह बात बार-बार आती है कि इसे

जहाँ यह सीरीज़ फिसलती है:

Daldal web series review में कुछ कमियाँ बार-बार सामने आती हैं:

– अपराधी का बहुत जल्दी सामने आ जाना

– हर एपिसोड के अंत में जिज्ञासा की कमी

– कहानी का ज़रूरत से ज़्यादा खिंचना

– भावनात्मक गहराई का अभाव

ये बातें कठोर लग सकती हैं, लेकिन यही कारण हैं कि यह सीरीज़ पूरी तरह असर नहीं छोड़ पाती।

अंत में क्या बचता है

Daldal web series review लिखते हुए बार-बार यह एहसास होता है कि यह सीरीज़ बेहतर बन सकती थी। इसमें सोच है, कुछ ईमानदार अभिनय है और अलग रास्ते पर चलने की चाह भी है। लेकिन ढीला लेखन और कमज़ोर कसाव इसे उसी दलदल में खींच लेता है, जिसका नाम इसने खुद चुना है।

मेरे लिए यह एक अधूरी संभावना जैसी रही। ऐसा लगा कि अगर कहानी को थोड़ा और कसा जाता, तो यह लंबे समय तक याद रहने वाली सीरीज़ बन सकती थी।

अगर आप यह सीरीज़ देखने जा रहे हैं, तो इसे तेज़ अपराध कहानी समझकर नहीं, बल्कि एक धीमी मानसिक यात्रा की तरह देखें। उम्मीदें सही होंगी, तो अनुभव भी थोड़ा बेहतर लगेगा।

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